आजादी के बाद क्रांतिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के परिवार की जो हालत हुई उससे हर भारतीय को शर्म से मर जाना चाहिए



प्रिय पाठकवृन्द! मैंने चन्द्रशेखर आजाद के सबसे विश्ववस्थ साथी सदाशिवराव मलकापुरकर का वर्णन किया था, जिन्होंने आजाद की जननी की सेवा कर राष्ट्र को कृतघ्नता के पाप से बचाया।

Condition of ram prasad bismil family after indpendence

श्री सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है कि कांग्रेस से अलग होने के बाद झांसी में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर मजदूरों के बीच काम करना शुरू किया। इसके लिए उन्हें कई बार जेला जाना पड़ा। 1952 में कम्यूनिस्ट पार्टी से मतभेद हो जाने पर वे उससे पृथक होक गये और फिर पार्टी राजनीति की ओर नहीं लौटे।

उन्होनंे अपने गुजर-बसर के लिए झाँसी के एक हाई स्कूल में अध्यापकी कर ली। उस शहर के पचकुईया मुहल्ले में वे एक किराए के मकान में वर्षों रहे। पुंजी के नाम पर उनके पास एक चारपाई, एक तख्त, एक अदद् बिस्तर और कुछ गिने चुने बर्तन थे। लेकिन अपने शहीद साथियांे की स्मृति की अमूल्य धरोहर उनके पास सुरक्षित थी। यही सामने रखकर वे स्वतंत्रता के बाद समाजवाद की स्थापना की लड़ाई में बिना रूके लगे रहे और चुपचाप चले गए।

झांसी के सातार तट पर आजाद जी फरारी के समय जिस कुटिया में रहे थे, वहाँ सदाशिव जी ने अपने अंतिम दिनों में आजाद जी का भव्य स्मारक बनवाने के लिए बहुत दौड-धूप की, पर उस स्मारक के उद्घाटक के अवसर पर सरकारी अधिकारियों ने उने बहुत दुव्र्यवहार किया। इससे वे बहुत आहत हुए और झांसी छोड़कर चले गये।

वहां उनके कई वर्ष गुमनामी और उपेक्षा मेे बीते। किसी को भी पता भी नहीं था कि आजाद का विश्वस्त साथी जीवित है या मर गया। 12 जुलाई 2002 को उनका निधन हुआ तो यह किसे पत लगा कि कितने बडे क्रांतिकारी की मृत्यु थी।

अखबार, रेडियों और दूरदर्शन तो खामोश बने रहे, टटपूंजिया नेता, पूंजीपति और दलाल जहाँ हर क्षण खबरो की दुनिया छाए रहते हों वहां सदाशिव जी को कौन पूछे?

प्रिय पाठकवृन्द! चन्द्रशेखर आजाद से पहले उनके दल का नेतृत्व करने वाले, कट्टर ईश्वर भक्त व आर्य समाजी होते हुए भी हिन्दु-मुस्लिम एकता के वास्तविक पक्षधर अमर क्रांतिकारीरामप्रसाद बिस्मिल अपना बलिदान देकर अमर हो गये, पर बाद में उनके परिवार की जो दुर्दशा हुई, उसे पढ़-सुनकर राष्ट्र की कृत्घनता पर रोना आता है। कवि प्रहलाद भक्त ने ‘अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की धरती’ में यह हर्दय विदारक वर्णन स्वयं बिस्मिल जी की आत्मा से करवाया है-

अट्टहास करि हँसी आत्मा, व्यग को धमय बोली बैन।
रहने दो वन्दन अभिनन्दन, यह नाटक करता बेचैन।।

देश हमारा आज कर रहा, आजादी का अमृत पान।
भारत माँ की कटी बेड़ियाँ, यही हमारा था अरमान।।

यह स्वतंत्रता कैसी भईया, नहीं पेट को रोटी-दाल।
पंूजीपति सत्ता से मिलकर, दीन-हीन की खींचे खाल।।

जिसको देखो वही रो रहा, गली-गली में हाहाकार।
बलिदानों का मूल्य न जाना, पद लोलुप हो गई सरकार।।

जिसके लिए प्राण की आहुति, दे दी वीर जवानों ने।
उनका रक्त पी लिया मिलकर, पंूजी भरे खजानो ने।।

जिस ममता ने लाल-चढाये, आजादी पा जाने को।
वही तड़फती, अश्रु बहाती, दर-दर फिरती दाने को।।

शीश कटाया रक्त बहाया, और किया जीवन बलिदान।
लोकतंत्र की उडे़ धज्जियाँ, धूमिल हुए सभी अरमान।।

मंै कहता हूँ मुट्ठी खोलो, मिट्टी नहीं उठाओ तुम।
कह देना अपने शासन से, और न अधिक सताओ तुम।।

कहते-कहते स्वर मेे तेजी, आने लगी आत्मा की।
आँखो में आंसू भर आये, छाती भरी महात्मा की।।

फाँसी पाकर मुक्त हुआ मैं, दुर्गति से जूझा परिवार।
दुनियां उनको दे न सकी थी, कोई जीने का आधार।।

सुनो सुनाता हूँ मैं अपनी, फाँसी के बाद कहानी को।
कुछ तो शर्म करे अब सत्ता, सुनकर साफ बयानी को।।

मैं वृद्ध पिता का बड़ा पुत्र था, मैंने फाँसी पायी थी।
जिससे बुढ़ी माताजी पर, बिपदा बदली छायी थी।।

औषधि और उपचार हीन, मर गया हाय छोटा भाई।
बहिन ब्रहनदेवी ने दुःख में, विष की थी पुड़िया खाई।।

बेटा-बेटी की मौतों को, झेल गई बूढ़ी छाती।
भारत माता की खातिर ही, दुःख में भी वो मुस्काती।।

भूखे तडफ-तडफ पिता ने, बरबस छोडे अपने प्राण।
स्मृति करता हूँ वे बातें चुभाती है ज्यों तीखे बाण।

माताश्री बची थी केवल, दीन-हीन सी थी असहाय।
बुरे वक्त में इस दुनिया में, कोई न होता कभी सहाय।

माह दिसम्बर का महीना था, सर्दी पड़ी कड़ाकेदार।
मेरी माँ, हाँ मेरी ही माँ, ठिठुर रही थी हे! करतार।।

फटी हुई धोती पहिने थी, पकड़े हुए कोठरी कोन।
मैं तन-हीन भला क्या करता, अश्रु बेबस मौन।।

देवयोग से उसी समय पर, साथी विष्णु शर्मा आयु।
दीन दशा देखी माता की, बैठे अपने नैन बहाये।।

कम्बल उठा दिया साथी ने, उसने रक्खा मेरा मान।
स्वतंत्रता का आलम छाया, माँ का नहीं किसी को ध्यान।।

स्वतंत्रता हित जिस जननी ने, अपना सर्वस्व लुटाया था।
धन सम्पत्ति, बेटे-बेटी भी, जीवन का होम चढ़ाया था।।

दया नहीं आयी शासन को, मिलने तक से कतराया।
उन शहीद बलिदानों का भी, हा ये कैसा फल पाया।।

उन्नीस सौ छप्पन में माँ ने, अपने तन का त्याग किया।
कष्टों की गोदी में जीकर, उसने भी विश्राम लिया।।

इसीलिए कहता हूँ सुन लो, ओ मिट्टी भरने वालो।
पावन मिट्टी को रहने दो, व्यर्थ हँसी करने वालो।।

प्रिय पाठकवृन्द! यह वीर जननी थी, जिसने फांसी चढते अपने बेटे का उत्साह बढ़ाया था। कवि के शब्दो में-

माताश्री देख बिस्मिल के, आँखों में भर आया नीर।
इस जीवन में तेरी सेवा, कर न सका उठती है पीर।।

माँ ने कहा कि बिस्मिल बेटा, हाय दुखित क्यों होता है।
साहस धैर्य दिया जो मैंने, उसे आज क्यों खोता है।।

आँखे गीली देख पुत्र की, माँ को लगा बड़ा आघात।
भारत मां के लिए जाना था, विकल हो रहा फिर क्यों तात।।

मैंने तो जाना था मेरे, बेठे में रजपूती आन।
बड़ा बहादुर लाल जना है, भारत की रक्खेगा शान।।

‘‘नहीं नहीं माँ डरा नहीं हूँ, यह ममता को करूण प्रणाम।
तुम विश्वास रखो हे अम्बे, आशीष दो कर रखो ललाम।।

काश! कोई दूसरा सदा शिवराव मलकापुरकर बन जाता, तो राष्ट्र कृतघ्नता के इस कलंक से बच जाता।

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