स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-संदेश - 'भारत जागो, विश्व जगाओ' (Swami Vivekananda's National Message - 'Wake up India, Wake up the World'

    स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रवाद का जो संदेश दिया 'भारत जागो, विश्व जगाओ' का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा है। स्वामी विवेकानन्द ने जब अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्म महासभा में हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधित्व बतौर अपने विचार रखे तो इसका संदेश विश्व भर से आए प्रतिनिधियों पर साफ  झलकता नजर आया। महासभा में विश्व से पहुँचे श्रीमती मराविन मेरी स्नैल, श्रीमती सेवियर, श्रीमती कैथरिन सेनबोर्न, श्रीमती जॉर्ज डब्ल्यू. हेल, श्री जे.जे. गुडविन, श्रीमती मार्गरेट नोबल, प्रो. जॉन हैनरी राइट, वैज्ञानिक निकोलस टेसला, एन.आर.आई. श्री धर्मपाल, प्रोफेसर तीरथराम गोस्वामी तथा अन्य पर स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए व्याख्यान का साफ  प्रभाव दिखाई दिया। इन सभी विचारकों पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उनके पथ का अनुसरण करते हुए उनके संदेशों को विश्व के कोने-कोने तक प्रचारित किया। राष्ट्रवाद पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से जो व्याख्यान दिये वो कम समय में ही अधिक समय के लिए विश्व को भारत के आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जोड़ गए।
स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रवाद का संदेश देते हुए कहा कि यदि पृथ्वी पर कोई ऐसा देश है, जिसे हम धन्य पुण्यभूमि कह सकते हैं, यदि ऐसा कोई स्थान है जहाँ पृथ्वी के सब जीवों को अपना कर्मफल भोगने के लिए आना पड़ता है, यदि कोई ऐसा स्थान है जहाँ भगवान की ओर उन्मुख होने के प्रयत्न में संलग्न रहने वाले जीवमात्र को अन्तत: आना होगा, यदि कोई ऐसा देश है जहाँ मानवजाति की क्षमा, दया, शुद्धता आदि सद्वृत्तियों का सर्वाधिक विकास हुआ है और ऐसा कोई देश है जहाँ आध्यात्मिकता तथा आत्मान्वेश का सर्वाधिक विकास हुआ है, वह देश भूमि भारत ही है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल से ही इस भूमि पर भिन्न-भिन्न धर्मों के संस्थापकों ने अवतार लेकर सारे संसार को सत्य की आध्यात्मिक सनातन और पवित्र धारा से बारम्बार प्लावित किया है। यहीं से उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों और दार्शनिक ज्ञान की प्रबल धाराएँ प्रवाहित हुई हैं और यहीं से धारा बहेगी, जो आजकल की पार्थिक सभ्यता को आध्यात्मिक जीवन प्रदान करेगी। आध्यात्मिक विचार ही जीवनदायी सिद्धान्त है न कि सैकड़ों अन्धविश्वास जिन्हें हमने शताब्दियों से अपने सीने से लगा रखा है। उन्होंने कहा की प्रत्येक आत्मा दिव्य है। जीवन का लक्ष्य है स्वयं के अन्दर आन्तरिक व बाहरी प्रकृति को वश में कर इस दिव्यत्व को प्रकट करना। इसे चाहे हम कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग या ज्ञानयोग से अथवा इनमें एक से या अधिक से या एकसाथ सभी से करें और स्वतन्त्र हो जायें। यही धर्म का सार है। अन्य सभी रहस्यवाद, अभिधर्म, कर्मकाण्ड, ग्रंथ, मन्दिर, प्रतीक आदि केवल गौण विवरण मात्र हैं।


स्वामी जी ने इस बात पर जोर दिया कि कोई यह बता सके कि भारत के राष्ट्रीय जीवन में वह कौन-सा समय रहा जब उसकी आध्यात्मिक विशालता में कमी आई हो और विश्व को प्रभावित करने में वह सक्षम न रहा हो। स्वामी जी ने हर विषय पर गौर किया, चाहे वह ऐतिहासिक हो, वैज्ञानिक हो या फिर साहित्यिक। उन्होंने हर दृष्टिकोण से राष्ट्रीयता को देखा और हर वर्ग को राष्ट्र से जोडऩे के लिए प्रेरित किया।
 
ऐतिहासिक दृष्टिकोण-
स्वामी जी ने भारत कि महानता पर कहा कि हम उस देश के वासी हैं जो अद्वितीय है, जिसका इतिहास महान है और भविष्य तो उससे भी महान है। स्वामी जी ने भारत के वैश्विक योगदान के बारे में जाग्रत किया कि हमारी मातृभूमि का विश्व पर अखण्ड ऋण है। जब मैं अपने इतिहास पर दृष्टिपात करता हूँ तब मुझे प्रतीत होता है कि विश्वभर में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं जिसका मानव-मन के उत्थान में इतना योगदान रहा हो। इसलिए मेरे पास अपने देश की निन्दा के लिए कोई शब्द नहीं हैं।
विज्ञानिक दृष्टिकोण-
स्वामी जी ने कहा कि भारत ने तो पुरातन काल में भी सबसे पहले वैज्ञानिक चिकित्सक दिए। गणित, बीजगणित, रेखागणित, खगोलशास्त्र और आधुनिक विज्ञान मिश्रित गणित की प्रगति में तो और बहुत कुछ किया है। इन सब का आविष्कार भारत में ठीक वैसे ही हुआ जैसे दस अंको का, जो वर्तमान सभ्यता के समस्या अनुसंधानों की आधारशिला है।
साहित्यिक दृष्टिकोण-
साहित्य में हमारे काव्य, महाकाव्य और नाटक किसी भी दूसरी भाषा में उपलब्ध साहित्य के उच्चतम् स्तर पर हैं, हमारे  अभिज्ञान शाकुन्तलम् को स्वर्ग और धरा का मिलन कहा गया है। 
शिक्षा-
शिक्षा के मूलभूत ढांचे के बारे स्वामी जी ने कहा कि शिक्षा, सूचनाओं का ऐसा भण्डार नहीं जो आपके मस्तिक में भर दिया जाता है और जो अपचन कर आपके मस्तिक में जीवनभर उथल-पुथल मचाता है। हमारे लिए वह जीवन बनाने वाली, मानव बनाने वाली, चरित्र बनाने वाली, विचारों को आत्मसात करने वाली होनी चाहिए। आप ने पाँच बातें भी ग्रहण कर लीं और उन्हें अपने जीवन-चरित्र में उतार लिया तो आप उस किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा अधिक शिक्षित हैं जिसने पूरा पुस्तकालय रट लिया हो। 

खेल-
शतरंज, ताश और पासे फेंकने के खेल भी भारत के आविष्कार हैं। वास्तव में भारत हर क्षेत्र में महान है। 

धर्म के प्रति दृष्टिकोण-

स्वामी जी ने कहा कि धर्म ही भारत की आत्मा है। जैसे धर्म, आध्यात्मिकता उसकी आत्मा है, उसका पुनरूत्थान भी धर्म से ही होना आवश्यक है। धर्म में ही भारत के प्राण हैं और जब तक हिन्दू जाति अपने पूर्वजों की धरोहर को नहीं भूलती, विश्व की कोई भी शक्ति ऐसी नहीं है, जो उसे नष्ट कर सके। जब तक शरीर का रक्त शुद्ध और सशक्त रहता है, उस शरीर में किसी रोग के कीटाणु नहीं रह सकते। हमारे शरीर का रक्त अध्यात्म है। जब तक यह निर्बाध गति से, सशक्त, शुद्ध तथा जीवन्तता से प्रभावित होता रहेगा, सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा। राजनीतिक, सामाजिक और दूसरे कोई भी बड़े दोष, यहाँ तक कि देश की दरिद्रता भी, सब ठीक हो जाएँगे। हमारी जाति का लक्ष्य कभी राजननीतिक महानता या सैन्य शक्ति नहीं रहा और कभी नहीं रहेगा।

स्वामी जी ने धन-सम्पदा पर कहा कि भारतीय जाति कभी भी इसे जुटाने में रत नहीं रहे। यद्यपि हमने अपार सम्पदा प्राप्त की, इतनी सम्पदा जितनी कोई दूसरा देश नहीं जुटा पाया होगा तथापि यह देश सम्पदा का पक्षधर नहीं रहा। यह सदियों से एक सशक्त जाति रही, परन्तु हम देखते हैं कि यह देश कभी सत्ता का पक्षधर नहीं रहा, कभी दूसरे देश को जीतने नहीं गया। भारत को कभी साम्राज्य की भूख नहीं रही। इस जाति का आदर्श सत्ता और सम्पदा कभी नहीं रहे।
उन्होंने ने कहा कि मैंने थोड़ी-सी दुनिया देखी है, पूर्व-पश्चिम की जातियों में गया हूँ, सर्वत्र मैंने पाया कि हर राष्ट्र का अपना-अपना आदर्श होता है, जो उसकी रीढ़ की हड्डी का काम करता है, उसे उस जाति की रीढ़ की हड्डी कहा जा सकता है। किसी देश की रीढ़ की हड्डी राजनीति होती है, किसी की सामाजिक संस्कृति, किसी की बौद्धिक संस्कृति इत्यादि। परन्तु हमारी भारत माता का आधार उसकी रीढ़ की हड्डी, धर्म और केवल धर्म है, क्योंकि इसी चट्टान पर इसके सम्पूर्ण जीवन का विशाल प्रासाद खड़ा है। भारतीय जीवन-शैली का यही तत्व है, उसके शाश्वत संगीत की यही धुन है, उसकी रीढ़ की हड्डी यही है, यही उसकी नींव हैं। उसकी अस्मिता का दूसरा कारण है-मानव जाति का आध्यात्मिकीकरण। अपने इस जीवन-मार्ग से वह कभी विचलित नहीं हुआ है।
जितेन्द्र अहलावत, जीन्द

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