राष्ट्र के लिये घातक है जातिवाद (Casteism is fatal for the nation)



जातिवाद इस देश के पतन के प्रमुख व मूल कारणों में से एक है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा अपने स्वार्थ के कारण जातिगत संगठनों का निर्माण और संवर्धन कराया जाता रहा है, जो आज प्रतिस्पर्धा के कारण विकराल रूप धारण कर चुका है। ब्राह्मण समाज, त्यागी समाज, जाट समाज, गुर्जर समाज, राजपूत, कश्यप, वाल्मीकि आदि आज अस्तित्व में आई लगभग सभी जातियों के अपने-अपने संगठन हैं। यदि संख्या की दृष्टि से देखा जाये तो इन समाजों और जाति संगठनों की संख्या जातियों के अनुरूप ही कई हजार होनी चाहिये। यदि पूछा जाये कि इनका जाति के रूप में संगठन बनाने का उद्देश्य क्या है तो सभी कहेंगे कि हमें अपने वर्ग के हितों की चिंता व संरक्षण करना है।
यदि मूल रूप से विचार किया जाये तो आजकल इसके पीछे राष्ट्र को छिन्न-भिन्न करने के षड़यंत्र कार्य कर रहें हैं। इनमें शत्रु राष्ट्र तो हैं ही, साथ में हिन्दू धर्म से इतर विदेशी मूल के अन्य मत पंथ भी शामिल हैं। लेकिन हम लोग निजी स्वार्थों की पूर्ति में इतने मग्न हैं कि सिर पर आसन्न खतरे को नहीं देख पा रहे हैं। आरक्षण की व्यवस्था, दूसरी जाति से वरीयता पाने का स्वार्थ, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा- चाहे राजनैतिक हो या संगठन पर कब्जा कर धन की लूट करना हो, कमोबेश सभी जातिगत संगठनों के पीछे यही प्रमुख कारण है। ऐसे तो विरले ही लोग होंगे जो किसी जाति के सामाजिक उत्थान के लिए निजी स्वार्थों को छोड़कर कार्य करते होंगे। यदि ऐसा कर भी रहे हैं तो भी इसे संकुचित हृदयता ही कहा जायेगा। पूरे शरीर की चिंता छोड़कर हम केवल शरीर के एक अंग की चिंता करें तो उसे और क्या कहें! इन सबका राष्ट्रीय हितों के साथ टकराव निश्चित ही है। सभी वर्ग के लोग यदि ऐसा ही करते रहे तो राष्ट्र की चिंता कौन करेगा! यदि केवल अपने वर्ग के पोषण की ही चिंता रही तो क्या इससे राष्ट्र की रक्षा हो सकेगी? क्या ये विग्रह का कारण नहीं बनेगा? उद्देश्य के संकुचित होने से आत्मिक बल कमजोर रहेगा तो इससे संगठन को बल कैसे मिलेगा? अंत में ऐसे संगठनों का राजनैतिक दुरुपयोग के अतिरिक्त और क्या लाभ रहेगा! 
ऐसे संगठनों के निर्माण का उद्देश्य क्या केवल जाति उत्थान ही है? व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं? क्या जाति या वर्ग की रक्षा या हितचिंता से अधिक आवश्यक राष्ट्र या मानवता ही हितचिंता नहीं? क्या जाति संगठनों की प्रतिस्पर्द्दा के कारण राष्ट्र को क्षति नहीं पहुंचेगी? राष्ट्र के असुरक्षित होने से क्या हम सुरक्षित रह पाएंगे? वस्तुतः वर्ग विशेष की चिंता से अधिक आज राष्ट्र की चिंता आवश्यक है। यदि कोई कहे कि जब सरकार द्वारा किसी एक वर्ग का तुष्टिकरण किया जाता है तो हम क्यों न अपने वर्ग की चिंता करें! इसके लिए मैं कहता हूँ कि यदि किसी घर को लूटा जा रहा हो तो हमारा क्या कर्तव्य है कि उसे रोकें या स्वयं लूट में शामिल हो जाएँ? और यदि बाद में पता लगे कि यह तो हमारा ही घर था, तब क्या होगा?
यदि हम इतिहास पर विचार करें तो पता लगेगा कि जातियों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। लगभग 1500 वर्ष पूर्व तक आधुनिक जातियों का कोई चिह्न भी नहीं था। यदि और अधिक पूर्व में जाएँ तो आदिकाल से लेकर महाभारत युद्ध के भी बहुत बाद तक केवल चार वर्णों का ही वर्णन मिलता है। 1400 वर्ष पूर्व महाराजा हर्षवर्धन के काल तक भी केवल 7 वर्गों का ही वर्णन है, जिनमें ब्राह्मण के अतिरिक्त व्यापारी, रथकार, शिल्पकार, शूद्र आदि नाम भेद से उन्हीं चार वर्णों से उत्पन्न वर्ग हैं। इससे पता लगता है कि कालान्तर में पाई जाने वाली जातियां उन चार वर्णों का ही विकृत रूप हैं।
ऋषियों के द्वारा वेद के आद्दार पर कार्यों के विभाजन के लिए वर्णों की व्यवस्था की गई थी। उनका उद्देश्य मनुष्यों में भेद उत्पन्न करना नहीं था। केवल समाज में व्यवस्था बनाना ही उनका उद्देश्य था। किसी भी वर्ण में छोटा-बड़ा या उच्च और हीन जैसी कोई बात नहीं थी। ये केवल योग्यता पर आधारित थे। जन्म से इनका सम्बन्ध नहीं था। योग्यता के अनुसार इनमें व्यक्ति के अपने ही जीवन काल में परिवर्तन भी संभव था। यह ऐसा ही है जैसे आद्दुनिक काल में शासन द्वारा पुलिस, अध्यापक, सफाई कर्मचारी, चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि वर्ग बनाकर सामाजिक व्यवस्था की गई है और सभी अपने कार्य को बदलने अथवा एक नौकरी को छोड़कर दूसरी पकड़ने में स्वतंत्र हैं। इनकी संतान भी पिता के व्यवसाय से अलग व्यवसाय के लिए स्वतंत्र है। इसी प्रकार वर्णों की भी व्यवस्था थी। इसके अनेक उदाहरण इतिहास में प्राप्त होते हैं। 
यदि इतिहास को जानकर विचार करें तो पता लगता है कि परमात्मा द्वारा भी कोई भेदभाव नहीं किया गया है। सभी मनुष्यों को हाथ, पैर, मुँह, आँख, नाक, पांच ज्ञानेंद्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ आदि समान रूप से प्रदान की गई हैं। यदि कहीं भेद भी दिखाई देता है तो वह कर्मफल के कारण से है, जातिभेद के कारण से नही, क्योंकि परमात्मा की व्यवस्था में जातिगत भेदभाव नहीं है। अतः जातिगत भेदभाव कृत्रिम और मनुष्य जनित है। यह राष्ट्र के लिए रोग है जो इसकी जड़ों को खोखला करता जा रहा है।
हमें व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठ कर राष्ट्र और मानव उत्थान की चिंता करनी चाहिए अन्यथा अब हमारे पास अधिक समय नहीं बचा है। विधर्मियों, शत्रु राष्ट्रों द्वारा राष्ट्र को तोड़ने के लिए हिंदू=आर्य जाति को वर्गों में बांटने के षड्यंत्र रचे जाते रहे हैं और अब यह कार्य अधिक तीव्र गति से किया जा रहा है। हमें इतिहास से प्रेरणा लेते हुए इन षड्यंत्रों को समझ कर इनके प्रतिकार के उपाय बहुत तीव्रता से करने होंगे अन्यथा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बर्मा, बांग्लादेश तो हाथ से निकल ही गया है-पूर्वोत्तर, केरल, पश्चिम बंगाल की स्थिति भी चिंतनीय है। चीन और पकिस्तान के साथ देश युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। देश के अंदर भी अनेक पाकिस्तान बने हुए हैं। युद्ध की स्थिति में अंदर के हालात कैसे हो सकते हैं, दिल्ली दंगों से अनुभव लेकर आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं।
समय समय पर विभिन्न समुदायों का गठन देश की रक्षा के लिए होता रहा है। बाद में धीरे धीरे वे जाति या धर्म के रूप में परिवर्तित होते चले गए। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि इसका गठन क्यों हुआ था? क्या इनका गठन राष्ट्र-रक्षा के लिए नहीं किया गया था? क्या इन संगठनों में सभी वर्गों के वीर सैनिक नहीं थे? क्या आज इनके जाति या धर्म के रूप में परिवर्तित हो जाने से इनके और हमारे पूर्वज बदल जायेंगे? आज विभिन्न जातियां अपने अपने गुणों का बखान करती हैं और किन्ही गुणों के कारण स्वयं पर गर्व करती हैं, क्या वे गुण अन्य मनुष्यों और वर्गों में नहीं पाए जाते? क्या वे गुण कथित वर्ग के सभी मनुष्यों में विद्यमान हैं? वस्तुतः विशेषता जातिगत या जन्म के कारण नहीं किन्तु गुणों के कारण होती है और ये किसी की बपौती नहीं है। जिनको उचित वातावरण मिलता है, उचित शिक्षा प्राप्त हो जाती है वही मनुष्य गुणी होकर महानता को प्राप्त हो सकता है। इसमें जाति विशेष का कोई महत्व नहीं है। क्योंकि जातियाँ कृत्रिम और मनुष्यकृत हैं। कोई भी मनुष्य उत्तम शिक्षा और उत्तम संस्कारों के प्राप्त होने से उत्तमता को प्राप्त हो सकता है। 
मेरी इन बातों पर विचार करें और अपनी शक्ति को राष्ट्र व मानवता की रक्षा में व्यय करें। राष्ट्र की रक्षा से ही हमारी सुरक्षा संभव है। ऋषि दयानन्द के शब्दों में यदि कहूँ तो एक भाषा, एक धर्म और एक लक्ष्य के बिना राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है।
रिपुदमन सिंह, बागपत, उत्तर प्रदेश
(Courstesy : ShantiDharmi)

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