लॉकडाऊन और एक ऐसा वर्ग जिसे पूरी तरह ये भी मालूम नहीं होगा कि इस शब्द का अर्थ क्या है

लॉकडाऊन एक शब्द जो आजकल हर एक की जुबान पर है। जिसका इस्तेमाल सारी दुनिया अपने नागरिकों को कोरोना वायरस से बचाने के लिए एकमात्र विकल्प मानकर अपना रही है। भारत में भी इस महामारी से बचने के लिए लॉकडाऊन को अपनाया गया। हालांकि यह पूरे देश के अच्छे के लिए किया गया, लेकिन इसके लागू होते ही एक ऐसा वर्ग भी था, जिसको इसके साथ दो-दो हाथ करने थे, जिस पर इसका सीधा असर पडऩे वाला था, एक ऐसा वर्ग जिसे पूरी तरह ये भी मालूम नहीं होगा कि इस शब्द का अर्थ क्या है, यह होता क्या है। वो है अपने गृहनगर से दूर अपनी आजीविका के लिए निकले मजदूर, जिन्हें अपने ही देश में प्रवासी का नाम दे दिया गया है। ये प्रवासी मजदूर जो आज हर बड़े शहर की सड़कों पर पैदल चलते देखे जा सकते हैं। जैसे ही प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की होगी कि अब से लॉकडाऊन शुरू, बस तभी से इन बेचारों के लिए संकट का काल शुरू हो गया होगा। जैसे ही इन्हे पता चला होगा कि कल तुम दिहाड़ी, मजदूरी, रेहड़ी आदि का काम नहीं कर पाओगे इनके लिए तो हर एक दिन बिताना मुश्किल हो गया होगा।

लॉकडाऊन के चंद दिनों बाद जब ना काम रहा ना सिर पर छत और ना रहने का कोई ठिकाना तो बेबस-लाचार ये निकल पड़े अपने घरों की तरफ। कोई सौ किलोमीटर, कोई 200 तो कोई 800 तक। पता नहीं कब पहुंचें, ना पहुंचें, जिंदा रहे ना रहे। ऐसा इसलिए कहा क्योंकि हर दिन खबरों में देखा कि कैसे कोई छोटा बच्चा पैदल चलते-चलते जिंदगी की जंग हार गया, कैसे कोई बुजुर्ग बीच रास्ते में निढाल होकर बैठ गया। कई ऐसे वीडियो आजकल सोशल मीडिया पर आ रहे हैं, जिन्हे देखकर किसी के भी आंखों में आंसू भर आएं। एक मजदूर बाप अपने बच्चे को कंधे पर बैठाए, मां एक बच्चे को हाथ में पकड़े दूसरे को गोद में उठाए निकल पड़े हैं कई सौ किलोमीटर का सफर तय करने। बिना ये जाने खाना मिलेगा, पानी मिलेगा, आसरा मिलेगा या नहीं। कईयों के पैरों में चप्पल तक नहीं नंगे पांव, ना दिन देखा ना रात। ये वो वर्ग है, जिसका इस महामारी से दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं था। 
एक महामारी जो बाहर से आई, जिसके आने का कारण भी कोई मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग से ही रहा होगा, क्योंकि किसी मजदूर को तो हवाई जहाज में सफर करना भी एक सपने जैसा है और इस महामारी का दंश शायद मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग तो सहन कर जाए, लेकिन अगर किसी ने इसे सबसे ज्यादा भोगा है, तो वह है ये मजदूर वर्ग, जो अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे, जिन्हे नहीं पता था कि क्या हो रहा है। 
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इनके लिए बहुत सी योजनाएं इस लॉकडाऊन के दौरान चलाई हैं, लेकिन इनकी सड़कों पर भीड़ को देखकर लगता है कि वो सुविधाएं पूरी तरह इनको मुहैया होने में कहीं कमी रह गई। हालांकि जब सरकार ने मजदूरों के लिए रेलें चलाई हैं, तब कहीं जाकर उन्हे थोड़ी राहत मिली, लेकिन बहुत सी जानें ऐसी भी थीं, जो सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई इस रेल सेवा तक नहीं पहुंच सकीं और इस लॉकडाऊन के काल ने उन्हे निगल लिया। वो मासूम बच्चे जो सफर में चलते चलते अपने माता-पिता के हाथों में दम तोड़ गए। कहने को अनगिनत घटनाएं हैं, परन्तु कुछ घटनाओं ने दिल-दिमाग को हिला दिया। इस कोरोना काल ने मजदूरों को बहुत दर्द दिया है। 
संदीप राजौरा

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