"यहाँ से बोटी-बोटी करने वाले साहब भी हैं, मोदी जी सहारनपुर जनसभा में

अभी मोदी जी सहारनपुर में जनसभा कर रहे हैं. यहाँ से भाजपा उम्मीदवार कौन हैं, उससे भी ज्यादा यह जानना जरूरी है कि यहाँ से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद है. जिसने 2014 के चुनावों में मोदी जी की बोटी-बोटी काट देने की धमकी दी थी. और वह मोदी को आज तक याद है और इसलिए
उन्होंने अभी कहा कि "यहाँ से बोटी-बोटी करने वाले साहब भी हैं, जो कांग्रेस के शहजादे के बड़े ख़ास हैं, वे बोटी-बोटी कहते हैं और हम बेटी के सम्मान और सुरक्षा की बात करते हैं".
और इसलिए मुझे यह व्यक्ति अटल जी से भी महान लगता है, कि यह व्यक्ति नेहरु की 'नेहरुवियत' और अटल की 'अटलियत' की तरह कुछ भी दबा कर, छुपा कर, बचा कर और और किसी लाग में लपेट कर नहीं रखता है. बात कितनी ही कड़वी और तीखी क्यों न हो, डंके की चोट पर और जनता के बीच में कह देता है.
अटल जी पी जाते थे, अटल जी की सरकार 'चरित्र' के मामले में UPA का प्रीक्वल थी और यह बात भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि बेशक 2014 में भाजपा की सरकार बन जाती, पूर्ण बहुमत से बन जाती लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जी की जगह कोई और होता तो यह सरकार UPA-3 ही होती.
इसलिए मैंने जो 'चरित्र' की बात की है, वह सत्ता का चरित्र है, जो नेहरू के ज़माने से चला आ रहा था, अटल जी ने उस चरित्र को बदलने और उससे टकराने की कोशिश भी नहीं की, उम्र के उस पड़ाव पर वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे, और उनकी तासीर और व्यक्तिगत चरित्र भी ऐसा नहीं था, कि वे नेहरूवाद को चुनौती दे सकते. और इसलिए अटल जी अपनी सत्ता के दौरान कांग्रेस के कारनामों पर गरिमा और मर्यादा की लिपाई पुताई करते रहे, पर मोदी ने ऐसा नहीं किया !
उन्होंने सबसे पहले कांग्रेस के पापों की ही खुदाई की, उन्होंने न खुद से जुडी मर्यादा की परवाह की और न ही कांग्रेस के नामदारों की ! लोग कहते हैं कि वे गांधी परिवार के खिलाफ बहुत नीचे चले गए, और मैं कहता हूँ कि उन्हें और नीचे जाकर इसे जड़ से उखाड़ देना चाहिए.
कांग्रेस एक दल के रूप में कुछ भी नहीं है, अगर इस कलंकी खानदान को इस पार्टी से अलग कर दो, तो इसकी हालत दो-चार साल में जनता दल जैसी हो जायेगी, जिसके बारे में आज इसके संस्थापक नेताओं को भी नहीं पता कि इसके कुल कितने टुकड़े हो चुके हैं.
लेकिन कांग्रेस नामक विकृति को अगर किसी ने अमर करके रखा है तो वह नेहरू का वंश है. जिसका भारत से, आपसे और मुझसे वैसा ही और उतना ही नाता है, जितना खेत में चारा चर रही भैंस से, उसके ऊपर बैठने वाले बगुले का होता है.
जो टाइड वाली सफेदी के साथ, बिना मेहनत किए, भैंस के ऊपर पल रहे परजीवियों से अपना पेट भरता है, जिसे कोई मतलब नहीं है...भैंस चाहे गड्ढे में जाए, कुएँ में जाए या मर जाए; यह खतरे की भनक लगते ही सेकंड के दसवें हिस्से में उड़ जाएगा.
पर भारत में कांग्रेसियों के रूप में अभी भी ऐसे करोड़ों भैंसिया और भैंसा हैं, जिनके जीवन का एक ही मकसद है 10 जनपथ के खूँटे से बंधे रहना, क्योंकि ये अपने जीवन की समस्त प्रोडक्टिविटी 'फर्स्ट फैमिली' को समर्पित कर चुके होते हैं.
और यह सब पिछले सत्तर साल से बिना किसी चिंता और बाधा के निष्कंटक चल रहा था, लेकिन 16 मई 2014 की वो 'मनहूस घड़ी', जब गुजरात से एक लट्ठमार चरवाहा, दिल्ली आ गया, जिसने न केवल कांग्रेसी तबेले में बल्कि इनकी मालिकान के जीवन में भी ऐसा ग़दर मचाया है कि लिबरल, सिक्यूलर, निष्पक्ष मीडिया का ब्लू आयड बॉय अमेठी से भागकर वायनाड पहुँच गया, जिसके आगे अब सिर्फ अरब सागर ही बचा है.

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