सुख का सागर - संतोष _ SUKH KA Sagar

‘जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान’ और ‘संतोषी नर सदा सुखी’ कहावत हमारे समाज में प्राचीनकाल से प्रचलित है। संतोष ही वह धन है, जिससे व्यक्ति को सुख मिलता है एवं वह आत्मसम्मान की जिन्दगी जीता है। वस्तुत: हमारे शासत्रों में संतोष को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। कहा गया है कि इन्सान के पास यदि सभी सुख-सुविधाएँ हो जाएं, करोड़ों की दौलत भी हो जाए या वह चाँद पर पहुँच जाए किन्तु जब तक उसमें संतोष नहीं है, वह कहीं सुखी नहीं रह सकता। यही नहीं मनुष्य में जब तक संतोष की भावना नहीं आती, वह शांति भी नहीं प्राप्त कर सकता। साथ ही वह सब कुछ होते हुए भी वह अशांत जिन्दगी जीता है और ताउम्र हाय-हाय करते हुए मर जाता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहते हैं कि-
‘‘सुबह होती है, शाम होती है,
उम्र यूं ही तमाम होती है।’’
इसीलिए हमारे प्राचीन वेद, पुराणों में संतोष को मानव जीवन का पर्याय माना जाता है। साथ ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्म एवं परम्पराओं, धैर्य और संतोष का मिला-जुला संगम है। अपनी सहनशीलता एवं संतोष की भावना की वजह से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति अत्यन्त उत्तम एवं गरिमामय मानी जाती है। साथ ही हमारे देश के लोग संतोष होने की वजह से अनेकों कष्ट, भूख एवं गरीबी में रहने के पश्चात् भी संतोष में रहते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के लोग धन-दौलत के पीछे दीवाने रहते हैं। संतोष की झलक उनके व्यक्तित्व में कम ही मिलती है। लेकिन एक बार जिस व्यक्ति के जीवन में संतोष आ जाता है, उसका जीवन असीम सुख एवं शांति से भर जाता है। संतोष का सुख वह होता है, जो सागर की गहराई से निकाले मोती के समान होता है एवं एक बार जिसे यह सच्चा मोती अर्थात् संतोष मिल जाता है, उसके सामने दुनिया के सारे हीरे, जेवरात फीके पड़ जाते हैं। हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि एवं ऐसे उच्चकोटि के साधु-संत हुए हैं, जिन्होंने संतोष को प्राप्त संसार के समस्त सुखों का त्याग कर दिया और संसार में आदर्श स्थापित कर गए कि संतोष ही परमसुख है। असंतोष पतन का मार्ग है। अत: मनुष्य को संतोष की भावना हमेशा बनाए रखना चाहिए क्योंकि संतोष का फल सदा मीठा होता है। जहाँ तक संतोष का तात्पर्य है तो कहा जा सकता है कि संतोष वह आत्मबल है, जिसके वजह से मनुष्य क्रोध, लालच, काम, क्रोध एवं मोह की कुप्रवृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मिक सुख के निकट पहुँच जाता है एवं निष्काम कर्म करते हुए फल की इच्छा-अनिच्छा से दूर हट जाता है। उसमें असीम धैर्य आ जाता है। यह धैर्य उसे आत्म-संतोषी बना देता है।
सामान्यत: हम संतोष का बाह्य संतोष एवं आत्म संतोष में विभाजित कर सकते हैं। बाह्य संतोष में व्यक्ति पूर्ण रूप से संतोषी नहीं बन पाता जबकि आत्म संतोष प्राप्त होने पर व्यक्ति निश्छल, निष्कपट और निष्काम होकर परम संतोषी हो जाता है। परम संतोषी व्यक्ति की आत्मा ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाती है एवं आत्मा-परमात्मा में दूरी कम हो जाती है। वैसे भी आत्म संतोषी व्यक्ति जीवन के सुख-दुख में अपना संतोष नहीं खोता और सुख-दुख, यश-अपयश, लाभ-हानि, जीवन-मरण में पूर्ण धैर्य और तटस्थ भाव अपनाकर चलता है। लेकिन हमारी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता का यह मूलमंत्र की संतोष ही सच्चा सुख है, आज लोगों से दूर होता जा रहा है। अंधी भौतिकता के नशे में आदमी इस सच्चे मोती की चमक से दूर होता जा रहा है एवं असंतोष के अंधर में दिन-ब-दिन घिरता जा रहा है। एक दिन यह अंधकार उसे इतना अधिक घेर लेगा कि उससे उसका उबरना मुश्किल हो जायेगा। अत: आज इस बात की आवश्यकता लोगों में संतोष की भावना जगाई जावे और संतोष के स्थान में घर किए लोभ, लालच एवं स्वार्थ की भावना को निकाला जा सके। लोगों को भी अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में आस्था रखते हुए पुन: संतोष की भावना को पुन: बलवती बनाना चाहिए।
यह सच है कि बीसवीं शताब्दी के अंत में परिस्थितियाँ इतनी विषम हो चुकी हैं कि इन्सान के संतोष का दायरा तंग हो गया है। चारों तरफ मची लूटमार, अफरा-तफरी, चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार से इन्सान इतना तंग आ चुका है कि वह असामान्य, भयभीत, आशंकाग्रस्त होकर जी रहा है क्योंकि उसे अपना जीवन चारों ओर से असुरक्षित लगने लगा है। ऐसे में वह संतोष रखना चाहे तो भी नहीं रख पाता क्योंकि उसके जीवन में विसंगतियाँ इतनी अधिक हावी हो चुकी हैं कि अपने जीवन मूल्यों से न चाहते हुए भी कटता जा रहा है। नैतिक मूल्य, चारित्रिक दृढ़ता, ईमानदारी, धैर्य और संतोष जैसे मूल गुण मनुष्य से दूर होते जा रहे हैं। इन विषम परिस्थितियों में यदि कोई इन्सान सच्चाई, ईमानदारी एवंं संतोष से जीता है तो लोग उसे ‘मिसफिट’ समझते हैं। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विषम हों, विसंगति जीवन में कितनी भी आएं, ये संतोष ही है, जो इन्सान को हर परिस्थिति में जीने का संबल देता है। इसलिए आज आवश्यकता है, हमें अपना खोया संतोष वापस लाने की जीवन मूल्य लौटा लाने की।
मानव जीवन में संतोष आसानी से नहीं जा जाता। संतोष पाने के लिए जीवन में, अत्यन्त धैर्य, तपस्या एवं त्याग करना पड़ता है। तब कहीं जाकर संतोष का प्रकाश हमारी आत्मा को प्रकाशित करता है। लेकिन एक बार हमारी आत्मा में संतोष की ज्योति जल जाती है, तो हजारों दीयों की रोशनी भी इसके आगे फीकी पड़ जाती है। अत: आज आवश्यकता इसी बात की है कि हम अपने जीवन का खोया संतोष वापस लाएं और यह विश्वास दृढ़ करें कि संतोष ही सच्चे सुख का सागर होता है। एक बार इस सागर का जल हमारे जीवन में झरने लगता है तो ताउम्र झरता रहता है और मोक्ष तक खत्म नहीं होता। संतोष के अभाव में ही आज घर-परिवार बिखर रहे हैं। मान-सम्मान खत्म हो रहे हैं। इन्सान के पास सब कुछ होते हुए भी वह सुख्ी नहीं है। असंतोष की भावना ने उसे उग्र बना दिया है। जीवन में जब वह जागता है, तो उसे अहसास होता है कि वह व्यर्थ भौतिकता में घिर कर इधर-उधर दौड़ता रहा। अंत में उसका संतोष धन ही उसे परमसुख देता है और आत्मा को शुद्ध कर परमात्मा की तरफ झुका देता है।
इस बात में कोई शक नहीं है कि आत्मा-परमात्मा का मिलन ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है, तो जीवन की सच्चाई है। वास्तव में संतोष ऐसी स्वानुभूति हे, जिसकी अनुभूति मनुष्य को जो सुख देती है, वह लोखों-करोड़ों में से भी नहीं मिलती। आत्म संतोष से जो सच्चा सुख इन्सान को मिलता है, वह किसी अन्य से नहीं मिलता। वैसे भी यदि मन दुखी हो तो सारे सुख, सुविधा एवं वैभव फीके लगते हैं, क्योंकि हमारे वेद, पुराण, धार्मिक ग्रंथ सभी का आशय यही है कि आत्म सुख ही सच्चा सुख है और आत्म सुख संतोष से ही प्राप्त होता है। भौतिक सुख क्षणभंगुर होता है। इसलिए मनुष्य को जीवन में संतोष का दामन नहीं छोडऩा चाहिए एवं धीरज रखते हुए अपने जीवन में उन्नति करने का प्रयास करते रहना चाहिए। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि संतोष रखकर आदमी जो प्रगति एवं विकास करता है, वह धीमा अवश्य होता है, किन्तु स्थायी होता है। संतोष के सहारे हुई प्रगति का सुख विरलों को ही नसीब होता है।
बढ़ते पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण एवं दिन प्रतिदिन फैलते मीडिया नेटवर्क ने लोगों को प्राचीन भारतीय संस्कृृति एवं सभ्यता से दूर कर दिया है। लोगों में आत्मिक सुख, संतोष की जगह अविश्वासी एवं उग्र बना दिया है। परिणामस्वरूप आदमी आज अपने ही अंधेरों से इस कदर घिर चुका है कि दो घड़ी शांति उसे नसीब नहीं है। सब कुछ होते हुए भी उसका मन उदास है क्योंकि भौतिक सुख-सुविधाएँ तो उसने जुटा ली हैं पर सच्चा सुख-संतोष नहीं जुटा पाया। लेकिन अब आदमी भौतिकता से ऊब रहा है और पुन: उसका झुकाव आध्यात्म, संतोष की ओर चला है। अत: सुख का सागर संतोष ही है, पैसा, धेला, धन-दौलत नहीं है, क्योंकि-
‘‘सुख का सच्चा सागर संतोष ही है,
असंतोष किसी के जीवन का
आधार नहीं हो सकता, क्योंकि
संतोष ही सुख के सागर में छिपा,
वह सच्चा मोती है, जिसकी
चमक कभी फीकी नहीं होती।’’



श्रीमती वन्दना सक्सेना, भोपाल
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