सनातन धर्म की वैज्ञानिकता - Indian Culture Blog I Vishwa Guru Bharat I

 मान लीजिये कि कोई ऐसा नीरस शुष्क एवं केवल भौतिकवादी बुद्धिजीची है कि जो न तो भगवान को मानता है और न ही कृतज्ञता को मानता है। यह संसार को केवल एक लेन-देन की मण्डी मानता है। यह मानता है कि बिना लिये दिये यहां का कार्य नहीं चलता। मात्र लेन-देन ही संसार का आधार है। ठीक है,  कोई कुछ भी मानने में स्वतंत्र है जिसका जैसा जी चाहे मानें। परन्तु विज्ञान को तो मानना ही पडेगा। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक दोनों ही इसे स्वीकार करते हैं। अपितु नास्तिक इसे अधिकार स्वीकार करता है। वह यह मानता है कि संसार परमाणुओं के मिलने से हुआ है। परमाणुणों के मिलन का नाम रचना है और बिखरन का नाम विनाश है। सब ग्रह उपग्रह परस्पर आकर्षण में बंधे हुए नियम से कार्य कर रहे है। ‘बिग बैंग’ से परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई और उनके मेल से धीरे-2 पदार्थों का निर्माण होता चला गया। ठीक है! हम थोडी देर के लिए उनके इस विचार से सहमति रखते हैं। परन्तु विज्ञान को विज्ञान की ही दृष्टि से देखना चाहिए, मूर्खता की दृष्टि से नही। ऐसा नहीं है कि विज्ञान में सब कार्य चमत्कारी ढंग से पूर्ण होते हैं। स्मरण रखिये कि विज्ञान में एक क्रमबद्धता (वतकमत) होती है और सब कार्य एक निश्चित क्रम में एक नियम के अनुसर करते है। यदि रत्ती भर भी उस नियम का भंग होगा तो कार्य कभी सम्पन्न नहीं हो सकेगा। संसार के सभी भौतिकवादी इसे एक मत से स्वीकार करते हैं। विज्ञान कि जितने भी कार्य आपको दिखाई देते हैं वे सभी इसी नियमबद्धता पर आधारित हैं। अब विचार करना चाहिये कि क्या नियम कभी बिना नियामक के बन सकता है?  क्या नियम स्वयं बन जाते हैं? सड़क पर बाई ओर लोग अपने आप चलने लग गये या किसी ने ऐसा करने के लिए कहा? बाजार में अधिक वाहनों आदि के होने से भीड़ होने पर लाल बत्ती होने पर रूकने एवं हरी होनें पर चलने का नियम स्वयं बन गया था या किसी ने बनाया? नियम कभी भी बिना नियामक की यह विशेषता है कि वह कहीं भी, कुछ भी अपने नियमों को नहीं बदलता, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कठिनाई का सामना क्यों न करना पडे। इसलिए यदि आप विज्ञानवादी हैं और यह  मानते हैं कि नियम बनाने वाला कोई नहीं तो इस बात को अपने मन से निकाल दीजिसे कि नियम स्वयं बनते हैं। अरे! जब सड़क पर चलने का साधारण सा नियम भी स्वयं नहीं बनता तो पदार्थों के निर्माण का महान कार्य क्या कभी बिना कर्ता के हो सकता है?
    दर्शन एवं विज्ञान दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। वैशेषिक दर्शन का ऋषि कहता है - ‘कारण अभावात् कार्य अभावः।’ अर्थात् कारण नहीं होगा तो कार्य नहीं होगा। यह एक सर्वतन्त्र सिद्धांत है। न्दपअमतेंस ज्तनजी है जो कहीं भी, कभी भी कुछ भी नहीं बदलती। जैसे पृथ्वी घुमती है इसे सब स्वीकार करते हैं। वैसे यह भी सिद्धांत है कि बिना कारण के कार्य नहीं होता। अब कारण कितने हैं? भारतीय वैज्ञानिकों, अपितु वैदिक विद्वानो ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है। उपादान करण वह कि जिससे वस्तु बनती है जैसे कि घड़ा मिट्टी से मेज लकडी से और तलवार लोहे से बनती है। जब तक मिट्टी लकडी एवं लोहा नहीं होगा तब तक घडा मेज व तलवार नहीं बन सकते। दूसरा है साधारण कारण वह कि बनाने के साधन, घडा बनाने के लिये चाक, दण्ड, पानी एवं समय की मेज बनाने के लिए कुल्हाडी रन्दा, कीलें आदि की और तलवार बनाने के लिए भट्ठी, हथौड़ा, अग्नि आदि की आवश्यकता है। समय तो सामूहिक रूप से सबमें लगता ही है। अब मिट्टी है, चाक है, दण्ड है, पानी है और कुल्हाडी रन्दा, कीले, भट्ठी हथौडा अग्नि आदि सभी कुछ है, परन्तु बनाने वाला कुम्हार, बढ़ई और लौहार नहीं है तो क्या ये सब वस्तुऐं अपने आप बन जायेंगी? कदापि नहीं, यही तीसरा कारण कारण निमित्त कारण कहलाता है।  ये वे तीन परम आवश्यक साधन हैं जिनके बिना कभी कोई पदार्थ या रचना संभव ही नहीं है। अतः इस स्थिति में नास्तिक लोगों का यह कहना ठीक नहीं है कि संसार मात्र परमाणुओं के मेल से स्वयं बन गया।नहीं-2 उपादान कारण प्रकृति साधारण कारण-समय आदि और निमित्त कारण स्वयं ईश्वर के बिना सृष्टि रचना की कल्पना ही व्यर्थ है। यहां एक शंका यह हो सकती है कि जैसे कुम्हार को घड़ा बनाने के लिए चाक, दण्ड पानी आदि की आवश्यकता है तो क्या ईश्वर को भी इस प्रकार के बाहरी साधनों की आवश्यकता थी
 जी नहीं! ईश्वर का कार्य बाहरी रूप से पदार्थों का निर्माण करने का नहीं है। बाहरी साधनों की आवश्यकता अल्प शक्ति वालों एवं स्थूल शरीर वालों को रहती है। सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, एवं परम सूक्ष्म ईश्वर को नहीं। वह तो परमाणुओं के भीतर भी व्यापक है और बाहर भी अतः उसे कार्य करने के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता ही नहीं है। वह अन्दर से अपना कार्य करता है। स्मरण रखिये ईश्वर का कार्य घड़ा, मेज या तलवार बनाना नहीं है अपितु मिट्टो, लकड़ी या लोहा (वह भी सूक्ष्म अवस्था में) बनाना है जो मनुष्य नहीं बना सकता।
    अब यदि आर्प इैश्वर को नहीं मानते तो विज्ञान का सारा दुर्ग एक फूक में उड जायेगा। अतः यह कहना कि पराणुओं में गति आने से सब पदार्थों का निर्माण स्वतः ही हो गया मूखर्ता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वेद मंत्र स्वयं कहा है- हिरण्यगर्भः समवर्तमाग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। संसार की उत्पत्ति से पूर्व प्रकृति भी थी और उसको गति देने वाला उसका स्वामी ईश्वर भी था। अतः यदि ईश्वर को न मानें तो यह महान् समस्या उत्पन्न हो जायेगी कि कोई भी पदार्थ बन नहीं सकेगा।
3    ज्ञान का अभाव: तीसरी महान् हानि होगी प्राणियों में और विशेष रूप से मनुष्यों में ज्ञान का अभाव होगा। ज्ञान दो प्रकार का है एक स्वाभाविक, दूसरा नैमितिक। स्वाभाविक ज्ञान जो पशुओं आदि है, इसमें कोई बहुत अधिक परिवर्धन नहीं किया जा सकता। हां! सामान्य रूप से उसका उपयोग हम अपने अनुसार करने योग्य उन्हें मोड़ लेते हैं परन्तु मनुष्यों का ज्ञान इससे भिन्न है। यह बढ़ाने से बढ़ जाता है और घटाने से घट जाता है। यदि सृष्टि के आरंभ में, ईश्वर मनुष्य को ज्ञान (वेद) न देता तो यह कभी भी ज्ञानवान नहीं बन सकता था। जो लोग (विशेष रूप से विकासवादी) यह कहते हैं कि मनुष्य में ज्ञान का उदय धीरे-2 हुआ, आरंभ में वह निरा जंगली ही था अपितु पशु ही था, वे बहुत बडी भूल में पडे हैं। उदाहरण के रूप में हमपने अपने शिक्षकों से, ुगुरूओं से शिक्षा पाई, उन्होंने अपने गुरूओं से और उन्होंने अपने गुरूओं से। यह क्रम पीछे की और चलते-2 एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जहां पर शिक्षा देने वाला कोई भी गुरू नहीं बचता। उस समस्या का समाधान संसार का महानतम आस्तिक ऋषि, पंतजलि करता है। वह कहता है ‘ स पूर्वेषामापि गुरू कालेनानवच्छेदात् (योग 1/26) वह गुरूओं का भी गुरू है जिसको काल भी बाधित नहीं कर सकता। विकासवादी कहता है कि मनुष्य का विकास बन्दर से हुआ और धीरे-2 उसके ज्ञान में वृद्धि हुई। प्रथम तो इस विचार में ही अनेकों भ्रांतियां हैं फिर भी यदि यह मान लिया जाये कि मनुष्य का विकास बन्दरों से हुआ तो फिर ज्ञान का उदय होना, वह भी उतनी उच्च कोटि का यह नितांत असंभव है। बाहर की परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों नहो, उससे केवल इतना तो प्रभाव पड़ सकता है कि उससे प्राणियों का ब्राहृ रंग रूप कुछ बदल जाये या उनका खान पान बदल जाये परन्तु यह संभव नहीं है कि उनमें अमूल चूल परिवर्तन इस सीमा तक हो जाये कि जिससे उनकी समूची जाति ही बदल जाये और वह अपना विकास इस सीमा तक कर ले कि ज्ञान का उदय उसे धरा से गगन तक बढ़ा दे। बन्दरों का स्वभाव तो क्रूर, लड़ने झगड़ने एवं छीना झपटी का है। मनुष्य में यह संवेदना, एक दूसरे से सहायोग की भावना कहां से आ गई? ज्ञान भी ईश्वर प्रदत्त है। यदि ईश्वर को न मानें तो फिर आदि में ज्ञान का अभाव होने से मनुष्य अज्ञानी ही रहेगा।
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