दिव्य दृष्टि द्वारा ईश्वर दर्शन संभव-साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी - Atam Drishti Masik Patrika I Vishwa Guru Bharat I

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा गोंडिया के निवासियों को अध्यात्म, विज्ञान व भक्तिरस के आनंद से परिचित करवाने के लिए महाराष्ट्र मेंश्रीमद्भागवत कथा नवाह ज्ञान यज्ञ आयोजित किया गया। कथा से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में बड़ी संख्या में सौभाग्यवती महिलाएँ पीताम्बर वस्त्रों में कलश लेकर चली। असंख्य सौभाग्य शाली स्त्रियों ने अपने सिर ऊपर कलश धारण किए और भागवत कथा का संदेश सर्वत्र वितरित करते हुए व विश्व शांति की कामना का प्रचार, प्रसार करते हुए कथा स्थल पहुंचीं। तत्पश्चात् श्रीमद्भागवत महापुराण का पूजन किया गया। आध्यात्मिकजाग्रति के प्रसार हेतु श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन संस्थान का एक विलक्षण प्रयास रहा है। जिसमें प्रभु की अनन्त लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया गया। इस कथा के दौरान सर्वश्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवत भास्कर महामनस्विनी साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी ने श्रीमद्भागवत कथा का माहात्म्य बताते हुए कहा कि वेदों का सार युगों-युगों से मानव जाति तक पहुँचता रहा है। ‘भागवतमहापुराण’ उसी सनातन ज्ञान की पयस्विनी है जो वेदों से बहकर चली आ रही है। इसीलिए भागवत महापुराण को वेदों का सार कहा गया है। साध्वीजी ने श्रीमद्भागवत महापुराण की व्याख्या करते हुए बताया कि श्रीमद्भागवत अर्थात जो श्री से युक्त है, श्री अर्थात् चैतन्य, सौन्दर्य, ऐश्वर्य। ‘भगवत: प्रोक्तम् इतिभागवत।’ भाव कि वो वाणी, वो कथा जो हमारे जड़वत जीवन में चैतन्यता का संचार करती है। जो हमारे जीवन को सुन्दर बनाती है वो श्रीमद्भागवत कथा है जो सिर्फ मृत्युलोक में ही संभव है।
    महापुराण के अंर्तगत महर्षि वेद व्यास जी ने लिखा ‘‘सत्यम्् परम धीमहि’’ उन्होंने परमात्मा को सत्य शब्द से सम्बोधित किया। वह हमें समझा रहे हैं कि परमात्मा एक ही है जिसके विषय में संतो, महापुरूषों ने कहा-‘एकं सद्विप्रा: बहुध वदन्ति’ वह एक ही शक्ति है जिसे विद्वानों ने अलग-अलग नामोंं से संबोधित किया हैं। आज परमात्मा को अनेकों नामों से पुकारा जाता है परंतु वास्तव में वह एक ही तो शक्ति। वही शक्ति सब में प्रकाश रूप में विद्यामान है। एक शक्तिपरमात्मा जो सत्य है सबमें प्रकाश रूप में विद्यमान है और उस प्रकाश स्वरूप परमात्मा का प्राक्ट्य जब भीतर होता है तो आंतरिक अंधकार दूर हो जाता है। यह पांच विकार, दु:ख-क्लेश, अशांति, अधीरता, चौरासी का भव-बंधन ये सब इसी अंधेरे की ही दी हुई सौगातें हैं। ईश्वर अंतर्जगत का भुवन भास्कार है। वेदों के ऋषियों ने कहा-‘आदित्यवर्णंतमस: परस्ताम्’ ज्योति की ज्योतिपरम-ज्योति है। वहाँ न तो चक्षु पहुँच सकते हैं, न ही वाणी, न मन ही, न तो बुद्धि से जान सकते हैं, न ही दूसरों को सुना सकते हैं। उस प्रकाशस्वरूप परमात्मा का दर्शन तो मात्र दिव्य दृष्टि के माध्यम से ही किया जा सकता है। जैसे इस लौकिक संसार को देखने के लिए दो आंखे दी हैं वैसे ही इस संसार के रचनाकार को देखने के लिए भी अलौकिक आंख दी है।
    जिस प्रकार से आप अपनी चर्म चक्षु के द्वारा दर्पण के माध्यम से अपने आपको निहारते हैं वैसे ही अपने अंत: स्थईश्वरीय प्रकाश और उसके अनंत वैभव का दर्शन दिव्य-दृष्टि के द्वारा कर सकते हैं। समस्त ग्रंथों व महापुरुषों ने उस सत्य स्वरूप परमात्मा को, ईश्वरीय प्रकाश को देखने का सशक्त साधन दिव्य-दृष्टि ही माना है। यह दिव्य-दृष्टि आध्यात्मिक व अति सूक्ष्म दृष्टि है इसे खोलने के लिए स्थूल साधनों या बाहरी ऑपरेशनों से जागृत नहीं हो सकती। यह मात्र शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा से ही खुल सकती है। इस अलौकिक उर्जा के स्रोत केवल और केवल एक पूर्णगुरु, एक तत्त्ववेत्ता महापुरूष ही होते हैं। मात्र उनमें ही इसके उन्मूलन की सामथ्र्य हैं।


    साध्वी जी ने बताया कि परीक्षित कलयुग के प्रभाव के कारण ऋषि से शापित हो जाते हैं। उसी के पश्चाताप में वह शुकदेव जी के पास जाते हैं। आज परीक्षित भी शुकदेव जी के श्री चरणों में बैठकर उस जगदीश्वर को जान लेना चाहते हैं। परीक्षित जी के मन में आज अनेकों ही प्रश्न हैं किन्तु जितने प्रश्न उसके मन में थे उतने ही नारद जी के मन में थे। नारद जी को समाधान मिला ब्रह्माजी से और परीक्षित की जिज्ञासा शुकदेव जी से शान्त हुई। गुरु और शिष्य की परम्परा शुरु से ही चलती आ रही है। सुश्रीसाध्वी कालिंदी भारती जी ने कहा कि अगर आप भी उस परमात्मा को जानना चाहते हैं तो आपको भी ऐसा ही मार्गदर्शक चाहिए। यह तो सर्वविदित है कि सूर्य प्रकाशमय तत्त्व है और चन्द्रमा भी प्रकाशमय है, किन्तु चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं है। जब सूर्य सुबह प्रकाशित होता है तब उसी के ही प्रकाश से ही चन्द्रमा तपता रहता है और रात को वो ही ताप शीतल होकर शीतलता प्रदान करता है। ऐसे ही गुरु भी सूर्य के समान हैं तथा चन्द्रमा एक शिष्य के समान। गुरु रूपी सूर्य के प्रकाश में तप कर ही शिष्य दुनिया को शीतलता प्रदान करने वाला ज्ञान आगे फैलाता है। कबीर जी को प्रकाशित करने वाले सूर्य रूपी गुरु रामानंद जी थे, नरेन्द्र को विवेकानंद बनाने वालेश्रेष्ठ गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंसजी थे, शिवाजी मराठा के अपरिमित बल के पीछे समर्थ गुरु रामदासजी की असीम शक्ति व प्रेरणा कार्यरत थी। अत: गुरु के बिना हम भी उस परमात्मा तक कदापि नहीं पहुँच सकते। यही सन्देश स्वयं प्रकृति भी हमें देती है।   

इस अवसर पर संस्थान के विषय में जानकारी प्रदान करते हुए साध्वी कांलिदी भारती जी ने कहा कि पंजाब में सर्वश्री आशुतोष जी महाराज ने उस समय संस्थान की शुरुआत की जब चारों और आतंकवाद की घोर कालिमा थी। उस समय चंद लोगों को लेकर शुरु हुआ यह संस्थान आज विश्व स्तरीय ख्याति प्राप्त कर चुका है जिसके करोड़ों की संख्या में अनुयाई हैं। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का उद्देश्य धर्म को व्यवसाय बनाना नहीं बल्कि ब्रह्मज्ञान के माध्यम से धर्म को जन-जन में प्रचारित करना है क्योंकि धर्म प्रदर्शन नहीं अपितु दर्शन का विषय है। संस्थान द्वारा अनेकों आध्यात्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में चेतना का संचार किया जा रहा है जो अपने आप मेंअद्वितीय मिसाल है।
   

आध्यात्मिक व सामाजिक तथ्यों से परिपूर्ण इस विलक्षण व रोचक कथा को श्रवण कर भक्तगण आनंद विभोर हो उठे। कथा के समापन पर पूर्णाहुति व हवन यज्ञ का भी अयोजन किया गया।
दिव्य दृष्टि द्वारा ईश्वर दर्शन संभव-साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी - Atam Drishti Masik Patrika I Vishwa Guru Bharat I दिव्य दृष्टि द्वारा ईश्वर दर्शन संभव-साध्वी सुश्री कांलिदी भारती जी - Atam Drishti Masik Patrika I Vishwa Guru Bharat I Reviewed by Jai Pandit Azad on 11:01 AM Rating: 5
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