हुतात्माओं का पूण्य स्मरण- HINDI SAHITYA I INDIAN SAHITYA

आर्य समाज ने अपने जीवन की इस एक शती में जितने बलिदान किये है, उतने विश्व की बहुत कम सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने दिये हैं। इनमें आर्य समाज के प्रर्वत्तक महर्षि दयानन्द द्वारा स्वयं अपने जीवन में प्रदर्शित मार्ग का अनुकरण करते हुए कुछ बलिदान ऐसे दिव्य है कि वह न केवल भारत किन्तु विश्व के इतिहास में अतिशय वरेण्य है। इस लेख में हम उन सब अनूठे शहीदों के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि प्रकट करते हुए उन आज की पीढ़ी के लिए भूले बिसरे श्रेष्ठ महान-भावों का उल्लेख करते है। जिन्होंने इस दिव्य गगनचुम्बी आर्य समाज रूपी भवन को ऊंचा करने की दिशा में नींव के पत्थर का काम किया है। उच्च शिखर पर लगी इंट से क्या इस नींव मेें अज्ञात रूप से पड़ी ईंट का महत्व किसी प्रकार कम कहा जा सकता है। निश्चय ही कभी नहीं।

    अछूतोद्धार के अपराध में जाति बहिष्कार व माता का बलिदान

आर्य समाज के प्रारंभिक दिनों की घटना है। पंजाब में जब अछूतोद्धार का कार्य प्रारंभ हुआ, तब सवर्ण हिन्दुओं की ओर से उसका विरोध कई प्रकार से हुआ। रोपड़ के पं0 सोमनाथ अपने अचल में इस सुधार के प्रमुख कार्यकर्त्ता थे। उनका और उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया गया। शहर के सब कुओं से उनका पानी बंद कर दिया। उन्होंने सर्वथा अविचलित रहते हुए जोहड़ों और नहर से पानी लेकर पानी प्रांरभ कर दिया। इस गदले पानी के प्रयोग के प्रयोग से उनकी वृद्धा माता उदर रोग से अत्यन्त पीडि़त हो गयी। डाक्टरों का इलाज किया गया। पर उन्हों साथ में यह भी कहाकि जब तक कुएं का निर्मल जल नहीं पिलाया जायेगा रोगिणी को आराम नहीं आएगा। पर कुएं का पानी तो बिरादरी ने सर्वथा बंद कर रखा था। वह तो तभी मिल सकता था जब पं0 सोमनाथ पिछले अछूतोद्धार के अपराध के लिए क्षमा और भविष्य में यह काम न करने की प्रतीज्ञा करें। माता की निरन्तर बिगड़ती  हुई हालत देख पं0 सोमनाथ चिन्तित और उदास रहने लगे। माता पुत्र की इस दशा को भांप गई। उसने कारण पूछा। पुत्र ने सब बात सच कह दी।
    रोगशयया से उठने का भरसक प्रयास करने पर न उठ बैठ सकते हुए भी उस वीर माता ने बड़े आवेश के साथ कहा- ‘‘पुत्र ऐसा कभी नहीं हो सकता। मुझे तो एक दिन मरना ही है।  अभी भी तैयार हूं। पर तुम धर्म पथ का कभी त्याग मेरे लिये न करना। इस नश्वर जीवन से धर्म अधिक प्यारा है।’’ इसका परिणाम हुआ कि वह वीर माता इस धर्म पथ पर दृढ़ रहती शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। इस देवी के बलिदान ने चमत्कार कर दिया। बिरादरी के पंचो ने अपनी भूल स्वीकार की और पं0 सोमनाथ और उनके परिवार के लिए स्वयं ही कुओं का पानी खोल दिया।

    स्टेशन मास्टर पं0 तुलसी राम की हत्या

सन् 1903 की घटना फरीदकोट रेलवे स्टेशन पर पं0 तुलसी राम दृढ़ आर्य समाजी स्टेशन मास्टर थे। जब भी खाली समय मिलता आर्य समाज का खूब प्रचार करते। शहर के जैनियों से इनका विशेष रूप से विवाद रहता। जैनी इन की युक्तियों से बहुत परेशान रहते थे। पं0 तुलसी राम ने बाहर से आर्य उपदेशक बुला वैदिक सिद्धांतों का प्रचार और जैनियों का खूब खण्डन कराया। जैनी इससे बहुत चिढ़ गये। एक दिन पंडित जी कहीं अकेले जा रहे थे। गोपी राम नामक जैनी ने मौका देख इनकी आंखो में पिसी हुई लाल मिर्च झोंक दी। इस प्रकार देखने में असमर्थ हो जाने पर इस नृशंस ने इनके पेट में छूरी घोंप दी। पता चला लगने पर अस्पताल ले जाया गया इलाज किया गया पर बच न सके। इस प्रकार धर्म सेवा करने हुए पंडित जी ने अपनी जीवन की आहुति दे दी।

    म0 रामचन्द्र जी की लाठियों की मार से वीर गति

    काश्मीर- जम्मू रियासत में म0 रामचन्द्र महाजन अछुतोद्धार के उत्साही कार्यकर्त्ता थे। जम्मू अखनूर तहसील में राज्य की ओर से खजांची थे। खाली समय में अछूतोद्धार का काम लगन से करते थे। अखनूर तहसील में बुटहरा नामक ग्राम है। यहां तथाकथित अछूत मेघ जाति ने  आपने वैदिक धर्म का बड़ी लगन से प्रचार किया। इस क्षेत्र में जाति अभिमानी राजपूत इनसे चिढ़ गये, रामचन्द्र जी ने यहां दलित जाति के बालकों के लिए पाठशाला खोलनी चाही। राजपूतों ने इसका विरोध किया। स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि 14 जनवरी,  1923 को राजपूतों ने इकट्ठे हो निहत्थरे शान्तिमय महाशय जी पर लाठियों की वर्षा की। फलस्वरूप इनके सारे अंग लहूलुहान और टूट गये। मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़े। तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। इलाज किया गया पर जख्म इतने गहरे थे कि बच न सके। 20 जनवरी 1933 को म0 रामचन्द्र जी वीर गति को प्राप्त हो गये। दृढ़ आर्य के इस बलिदान से राजपूतों के कठोर हृदय बदल गये जो विरोधी थे, उन्होंने ही पाठशाला के लिए भूमि और धन दिया। म0 रामचन्द्र की इस शहादत की स्मृति में अब प्रतिवर्ष आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से यहां शहीदी मेला लगता है।

    दो आर्य समाजियों का बिरादरी से बहिष्कार

    कनखल हरिद्वार में दो आर्य समाजी रहते थे, एम मा0 मूलचन्द जो स्थानीय स्कूल में अध्यापक थे और दूसरे मा0 उमराव सिंह वहां पनसारी की दुकान करते थे। दोनों कट्टर और दृढ़ आर्य थे। वहां के पौराणिक इनके कट्टर विरोध ही नहीं करते थे पर बिरादरी बहिष्कार के रूप में इन दोनों को कई प्रकार की यातनाएं भी देते थे। अध्यापक मूलचन्द जी को स्कूल से निकलवा देने अथवा तबदील कराने के भरसक प्रयत्न किए गए। पर मास्टर जी का काम सर्वथा संतोषजनक था, इसलिए पौरारिकों की दाल न गल सकी। पर इन की कुचेष्टाओं से मास्टर जी के 10 रूपये मासिक वेतन पर 10 रूपये वार्षिक आर्य कर जरूर लग गया!
    मा0 उमराव सिंह को भी कड़ी यातनाएं सहनी पड़ी बिरादरी से बहिष्कार, कुएं से पानी लेने पर रोग, सामाजिक असहयोग दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में पग-पग पर बाधा इत्यादि अनेक विपत्तियां इन्हे सहनी पड़़ी पर यह दोनों आर्य वीर अपने धर्म मार्ग पर दृढ़ रहे। अन्ततः इन दोनों को पवित्र और शुद्ध जीवन का प्रभाव कनखल की समझदार हिन्दु जनता पर पड़ा और लम्बे संघर्ष के बाद इन दोनों के प्रति सद् व्यवहार प्रारंभ हुआ।

    वैदिक रीति से अन्तेष्टि कार्य का बहिष्कार

गुजरांवाला के लाला गोविन्द सहाय कपूरथला रहते थे। वहां उनकी माता का देहान्त हो गया और उन्होंने दृढ़ आर्य होने के नाते वैदिक रीति से अन्तेष्टि संस्कार करने का निश्चय किया। नगर की बिरादरी की ओर ने कड़ा विरोध हुआ पर गोविन्द सहाय अपने निश्चय पर अटल रहे। जालन्धर से महात्मा मुंशीराम तथा अन्य कुछ सभासद पहुंचे। हिन्दुओं ने अरथी बनाने और दाहकर्म का अन्य सामान देने से इन्कार कर दिया। अन्ततः मुसलमानों की दुकानों से सारा सामान खरीदा गया और यथा विधि संस्कार किया गया। लाला गोविन्द सहाय की इस दृढ़ता का नगर निवासियों पर प्रभाव पड़ा और उनमें कई आर्य समाज के सभासद बन गए।

    सरकारी नौकरियों में आर्य समाजियों का उत्पीड़न

    आर्यसमाजियों को जहां इस प्रकार अपने ही सम्बन्धियों बिरादरी के लोगों और नगर निवासियों की ओर से घोर अत्याचार सहने पड़ते थे वहां आर्य समाज विदेशी गोरे शासकों की आंखो में भी कांटे की तरह चुभता था। जो आर्य समाजी सरकारी नौकर थे, उन पर कड़ी नजर रखी जाती थी, उनकी फाईलों पर यह लिखा जाता कि यह काम तो अच्छा करता है पर आर्य समाजी है। इस पर नजर रखी जाए। इनकी तरक्की रोक दी जाती, बार-बार तबदील कर उन्हें तंग किया जाता। यह भी कि सरकारी नौकरी और आर्यसमाज दोनों में से एक का चुनाव करों, दोनों काम इकट्ठे नहीं चल सकते। इन परिस्थितियों में भी उस युग के आर्य पुरूषों ने प्रशंसनीय दृढ़ता और धर्म तत्परता दिखाई। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैः-

    श्री लक्ष्मण रावकी दृढ़ता

इन्दौर के श्री लक्ष्मणराव पुलिस विभाग के कार्यालय में अच्छे ओहदे पर नौकर थे और आर्य समाज के प्रधान भी थे। उन्होंने आर्य समाज के नगर कीर्तन के लिए लाईसंेस का प्रार्थना पत्र दिया। अंग्रेज अफसर के पास मामला पेश हुआ। उन्हें बुला कर धमकी दी गयी कि सरकारी नौकरी करते हुए आर्य समाज का काम नहीं कर सकते। दोनों में से किसी एक को चुन लो। श्री लक्ष्मण राव ने दृढ़ता से कहा ‘ मैं कुछ रूपयों के लिए अपना धर्म नही छोड़ सकता।’ गोरा अफसर यह उत्तर सुन कर हैरान हो गया। उसने अब अपना रूख बदला और हमदर्दी के साथ फुसलाना चाहा। पर राव महोदय दृढ़ रहे। सरकारी नौकरी को लात मार आर्य समाज की सेवा में अडि़ग रहे।

    जाट रैजिमेंट का जनेऊ उतारने से इन्कार

    एक रेजीमेंट के सिपाही आर्य समाजी थे। फौजी अफसर ने उन्हें यज्ञोपवीत उतारने की आज्ञा दी। यह रेजिमेंट जाट सिपाहियों की थी उन्होंने इस आज्ञा को मानने से इन्कार कर दिया। जाट महासभा द्वारा इस आज्ञा को रद्द कर देने का आवेदन पत्र भेजा गया। इसे भी फौजी अफसरों ने बगावत समझा। रेजिमेंट के अधिकांश सिपाहियों ने यज्ञोपवीत उतारना, पाप समझा और आदेश के विरोध में नौकरी छोड़ दी।

    पं0 भगवानदीन द्वारा सरकारी नौकरी का त्याग

उत्तर प्रदेश के प्रमुख आर्य नेता पं0 भगवान दीन जी सरकारी नौकर थे और दृढ़ आर्य समाजी थे। उन पर दबाव डाला गया कि वे आर्य समाज छोड़ दे। पर वे कर्तव्य पथ पर अडिग रहे। उन्हें अन्यन्त्र आवश्यक कार्य के हेतु कुछ दिन की छुट्टी लेनी थी। पर वह जानबूझ कर नहीं दी गयी। पंडित जी ने तंग आकर सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। पंडित जी ने सेवा की ओर कई वर्ष तक उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान रहे।
पटियाले में सिख शासकों द्वारा दी गयी आर्य पुरूषों को जेल
आर्य समाज के इतिहास में पटियाला रियासत के आर्य समाजियों पर ब्रिटिश सरकार के इशारे पर चलाया गया, राजद्रोह का मुकदमा बड़ा प्रसिद्ध है। इसमें तो रियासत को मुंह की खानी पड़ी थी।
    पर सिख रियासत होने के हेतु आर्य समाजियों पर वहां जो अत्याचार किये गये उस की ठीक ठीक जानकारी आज के आर्य समाजियों को कम है। इसी प्रसंग की ओर से किये गये नृशंस व्यवहार और उत्पीड़न का हम यहां वर्णन करते है।
    रियासत के कुछ सिख आर्य समाज और महर्षि दयानन्द पर ट्रैक्ट और अश्लील पुस्तकें लिख कीचड़ उछालते रहते थे। मिदौड़ आर्य समाज के प्रधान म0 रौनक राय ने सिखों की इन पुस्तकों के उत्तर में खालसा ग्रंथ की हकीकत एक पुस्तक लिखी। कई मास तक बिकती रही और अच्छा प्रचार हुआ। एक अध्याय नियोग पर था। जिसमें सिद्ध किया गया था कि सिख गुरू इस आपद धर्म के विरोधी न थे। इस पर एक सिख ने आंदोलन किया और म0 रौनक राय को सिख धर्म के अपमान के बहाने 23 जून को गिरफतार कर हवालात में डाल दिया गया। भिदौड से चार कोस दूर एक ग्राम के आर्यसमाजी म0 बिशम्बर दास को भी पकड कर हवालात में डाल दिया गया। अभियुक्तों को यह भी नहीं बताया गया कि उनका अपराध क्या है। दोनों की दुकान और मकानों की तलाशी ली गई। जमानत की अर्जी नामन्जूर की गयी। मुसलमान हाकिम के सामने पेश किए गए। 10 मास तक मुकदमा चला अभियुक्तों की ओर से लाहौर और रावलपिण्डी से कई आर्य वकील आते, उन्हे भयानक कष्ट के अतिरिक्त बाहर से रियासत मे आने का 20 रूपया टैक्स देना पड़ता। कई पेशियों के बाद अभियुक्तों को एक एक वर्ष जेल और दो सौ रूपया जुर्मानाऔर जुर्माना न देने पर चार मास की अतिरिक्त जेल का दण्ड दिया गया। अपील की गयी पर कोई लाभ न हुआ।
    इस मुकदमें से जहां दोनो आर्य महानुभावों की दृढ़ता का सिक्का जमा, वहां साथ ही उनके पीछे समस्त आर्य जगत था- यह सिद्ध हो गया। इसके अतिरिक्त सिख रियासत की धांधली की पोल खूल गई।
    हमने इस लेख में कुछ थोडे ही उन आर्य वीरों और बलिदानों का वर्णन किया है जो आज के आर्य पुरूषों के लिए प्रायः भूले बिखरे है। शताब्दी के इस ऐतिहासिक पर्व पर हमें इन चमत्कारी पूर्वजों का अनुकरण करने का प्रयत्न करना चाहिए तभी यह समारोह सफल हो सकेगा।


ले0 पं0 दीनानाथ सिद्धांतालकार, आर्योपदेशक एवं पत्रकार
आप सभी प्रांतो में आर्य समाज का कार्य कर चुके हैं। बिहारी आपकी सेवा का विशेष ऋणी है।
  -संपादक

Courtesy
SHANTI DHARMI MONTHLY PATRIKA
हुतात्माओं का पूण्य स्मरण- HINDI SAHITYA I INDIAN SAHITYA हुतात्माओं का पूण्य स्मरण- HINDI SAHITYA I INDIAN SAHITYA Reviewed by Jai Pandit Azad on 10:19 AM Rating: 5
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